अस्तमित रवि- अस्तराग छोड़ गए

लोग भाग रहे हैं पारसके पीछे, पागलों की तरह। मैं तो यहाँ मख़मूर हूँ किसी की यादआवरी में, ढ़ूंढ रहा हूँ उसे यहाँ, वहाँ, न जाने कहाँ – प्रकृति के कण कण में – जीवन के हर स्पंदन में। कहाँ चले गए सृष्टि के वे अनमोल रतन, महाकाश के महाशून्य में– जो कभी थे सुबह के राग-भैरव में, फूलों की पंखड़ियों पर पड़े ओस की धड़कनों में, धूप- बारिश की आँख-मिचोली में, भीगे बादलों की मायूसियों में – जीवन की हर ख़ुशी में – ख़ुशीयों के पीछे ग़म में – हर दिशाओं के हर कोने में। हे कविराज ! हमारे जान-आफ़रीन, आलोक-स्तम्भ – तुम नहीं गए कहीं भी – कल तुम हमारे साथ थे, आज तुम हमारे हृदय में विराजमान हो और आगे भी रहोगे हमेशा के लिए। तुम्हारी रचित काव्य-लहरियाँ प्रवाहित हो रही है हमारे प्राणों में, हमारी आत्मा में – काल की सीमाओं को लाँघती हुई।

हे कविन्द्र, हे कवि कुलगुरु, तुम चले गए, पर छोड़ गए अपनी कवित्व-कला, अपनी सृजन- शक्ति से उद्भाषित अमूल्य साहित्य का विपुल भंडार। लेकीन बदले में तुम्हे क्या मिला – एक भग्न हृदय, गंभीर वेदना, गहरी मायूसी, गहरा अवसाद, अपनों से मिला अपमान, उपेक्षा और बेशुमार निंदा – तुम्हारी इख़्तियारी पर कालिख लगाने की कई बार कोशिश की गई, लेकीन तुमने इन नापाकियों से ख़ुद को ख़ालिस रखा। तुम्हारी ज़िदगी का एक और भी दुखद पहलु था – स्वजनों की अकाल मृत्यु। एक के बाद एक उठती हुई उन मृत्युदायी लहरों ने तुम्हे मातम के रेगिस्तान में धकेल दिया। तुम दुखी मन लिए भटकते रहे – गुमशुम तन्हाई में, वीराने में।

पर खुदकुशी जैसे उन हालतों से ऊवर कर अपनी अंत-स्थित ज्योतिशक्ति से पुन: निखर उठे- कीचड़ में खिले कमल की तरह।

इश्क की बहार आयी तुम्हारी ज़िदगी में बहुत बार उभरते हुए यौवन की तरह –कई रुप, कई रंग, कई सुर, लय, ताल में। हर बहार की अलग-अलग दास्तान। तुम्हारे दिल के कानन में उन गुलअफ्सों के कदम रखने पर मूरझाए हुए फूलों में रंग खिलने लगे। इत्तफ़ाक से प्यालों में इश्क छलक ने से पहले ही सूख गए, लेकीन उनकी ख़ुशबू महकती रही तुम्हारे एहसास के रोम रोम में – जीवन के आख़िरी पल तक। जाने-अनजाने में उन दिलनशीनों ने बिछुड़ने से पहले ऐसी ग़ज़ले पेश कर दी जिनमें कभी राग विलावल थी, कभी राग किरवानी – कभी और कुछ, जिन में ख़ुशी थी, आनन्द थे – सुख, कभी दुख। कभी दिन ढलने से पहले रात की राग फैल गई।

ऐ ख़ुदा के बन्दे, तुम वापस चले ज़िदगी और मौत के उस पार परमात्मा की पनाह में, लेकीन तुम्हारे पार्थिव जीवन की दर्दनाक घटनाएं – तुम्हारे मानसिक उदासीपन की हकीकत कभी खुल कर सामने नहीं आई। परंतु तुम्हारे काव्य के समुंदर की गहराई में अगर गोते लगाए, वहाँ के एक एक रत्न पर गौर आजमाएँ, तो तुम्हारे चरित्र के एक और तस्वीर अनुभव के पर्दे पर चिर्त्तित होति है – जो ख़ुद ग़मज़दा है और दुसरे को भी ग़म-ए-दिल कर देती है।

हमने सुना है एक बैरगी राग का आलाप – ज़िदगी की जंग से थके हुए एक दुखी हृदय अपने ग़म के अलफ़ाज़ को उदास सुर में इज़हार कर रहे हैं। आज भी गूँज रहा है वह सुर – जोरासाँको के प्रांगन में, बाहर-भीतर – ठाकुर हवेली के ईर्द-गिर्द। हे कवि, साक्षी है शांतिनिकेतन – वहाँ के पेड़-पौधें – उपासना मंदिर – आज भी रोते रहते हैं कवि के विरह में – जब रात उतरती है । वही पद्मा नदी के माझी मल्लाहें आज भी कवि की याददिहानी में दरिया में डोलते रहते हैं। आज भी कालिम्पोंग की पहाड़ियों की सरसराहट में तुम्हारी आवाज़ की प्रतिध्वनी सुनाई देती है।

हमने देखा है बड़े-बड़े उन दो नयनों की रुहानी निगाहें – उनके पीछे बहती हुई अश्क की धारा – अंत:सलिला नदी की तरह। एक-एक अश्रु, एक-एक मोती। और उन मोतियों की प्रवाहसे एक-एक मोती चुन-चुन कर हार बनाई है हमने – विश्व-जननी के गले में सजाने के लिए।